72 बिलियन डॉलर का सच और रुपये की असली कहानी
सोना और भारतीय - ये रिश्ता सिर्फ लेन-देन का नहीं, भावनाओं का है। शादी का गठबंधन हो या बच्चे का जन्म, दिवाली की पूजा हो या मुश्किल वक्त की सेविंग - सोना हर घर की पहचान है।
लेकिन इस पहचान की एक बड़ी आर्थिक कीमत भी है। भारत हर साल लगभग 72 बिलियन डॉलर यानी 6 लाख करोड़ रुपये का सोना आयात करता है। और इस पूरे बिल का भुगतान हम डॉलर में करते हैं। इसमें से 90% सोना ज्वैलरी, शादियों और लॉकर में चला जाता है।
अब सवाल उठता है - अगर पूरा देश एक साल तक सोना खरीदना बंद कर दे तो क्या होगा? क्या 1 डॉलर 80 रुपये का हो जाएगा? क्या रुपया जीत जाएगा?
लोगों को लगता है: "Stop buying gold = stronger rupee"। सुनने में लॉजिकल है। Except... economies are never that simple.
1. हकीकत: सोना बंद करने से भी डॉलर की जरूरत खत्म नहीं होगी
आंकड़े बताते हैं कि भारत का सबसे बड़ा आयात सोना नहीं है। हमारी सबसे बड़ी इंपोर्ट लिस्ट ये है:
1. कच्चा तेल - 135 बिलियन डॉलर से ज्यादा
2. इलेक्ट्रॉनिक्स - 90 बिलियन डॉलर
3. सोना - 72 बिलियन डॉलर
4. खाद्य तेल - 20 बिलियन डॉलर
5. फर्टिलाइजर - 15 बिलियन डॉलर
यानी सोने का आयात जीरो हो भी जाए, तब भी भारत को हर साल 250 बिलियन डॉलर से ज्यादा का इंपोर्ट करना ही पड़ेगा। इसके लिए डॉलर चाहिए ही चाहिए।
इसीलिए 80 रुपये प्रति डॉलर का सपना अवास्तविक है।
2. फिर भी फायदा होगा, लेकिन सीमित
हाँ, 72 बिलियन डॉलर की बचत से रुपये पर दबाव जरूर कम होगा। अनुमान है कि रुपया 86-87 से सुधरकर 80-81 रुपये प्रति डॉलर तक आ सकता है।
इसके तीन सीधे फायदे होंगे:
A. पेट्रोल-डीजल थोड़ा सस्ता होगा - क्योंकि तेल का आयात डॉलर में होता है।
B. इंपोर्टेड सामान सस्ता होगा - मोबाइल, लैपटॉप, मशीनरी की कीमत घटेगी।
C. महंगाई थोड़ी कम होगी - क्योंकि ट्रांसपोर्ट और इंपोर्ट कॉस्ट घटेगी।
लेकिन ये पूरी तस्वीर नहीं है। अब आता है वो हिस्सा जिस पर कोई बात नहीं करता।
3. वो सच जो लोग भूल जाते हैं: भारत सोना एक्सपोर्ट भी करता है
हम सिर्फ सोना खरीदते नहीं हैं। हम हर साल 28.5 बिलियन डॉलर की ज्वैलरी एक्सपोर्ट भी करते हैं।
सिंपल लॉजिक है - "You can't export jewellery made from air." अगर सोने का आयात बंद हुआ, तो ज्वैलरी बनाना भी बंद हो जाएगा। एक्सपोर्ट ऑर्डर सूख जाएंगे।
और ये इंडस्ट्री छोटी नहीं है। इस पर 50 लाख से ज्यादा लोग निर्भर हैं - सूरत के कारीगर, मुंबई के डिजाइनर, कोलकाता के सुनार, शादी-ब्याह की सप्लाई चेन।
अगर डिमांड क्रैश हुई तो सबसे पहले मुनाफे पर नहीं, लोगों पर चोट पड़ेगी। लाखों नौकरियां जाएंगी। वर्कशॉप बंद होंगे। एक्सपोर्ट से आने वाला 28.5 बिलियन डॉलर भी बंद हो जाएगा।
4. सोने का दाम गिरा तो घर-घर गरीबी का एहसास होगा
भारतीय परिवारों के पास आज लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर का सोना जमा है। ये भारत की पूरी GDP के लगभग बराबर है।
अगर सोने का आयात बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का दाम 10-15% गिर गया, तो अचानक हर परिवार खुद को 15% गरीब महसूस करेगा। भले ही बैंक में पैसा उतना ही हो।
और जब लोग खुद को गरीब महसूस करते हैं, तो वो खर्च कम कर देते हैं। कार नहीं खरीदते, घर नहीं बनवाते, शादी में कम खर्च करते हैं। इससे पूरी इकोनॉमी स्लो हो जाती है।
5. ग्रामीण भारत पर सबसे बड़ी मार पड़ेगी
शहरों के लिए सोना निवेश है। लेकिन ग्रामीण भारत के लिए सोना इमरजेंसी फंड है।
भारत का गोल्ड लोन मार्केट 15.6 लाख करोड़ रुपये का है। करोड़ों किसान, छोटे दुकानदार, महिलाएं खेती, शादी, इलाज, बच्चों की पढ़ाई के लिए सोना गिरवी रखकर लोन लेते हैं।
अगर सोने का दाम तेजी से गिरा, तो उनके लोन के पीछे रखी गई जमानत कमजोर हो जाएगी। बैंक नया लोन नहीं देंगे। पुराना लोन चुकाने का दबाव बनेगा।
यानी "गोल्ड बैन" का सबसे बुरा असर अमीरों पर नहीं, किसानों और गरीब परिवारों पर पड़ेगा। ग्रामीण क्रेडिट सिस्टम हिल जाएगा।
6. मजबूत रुपये का नुकसान: एक्सपोर्ट घटेगा, नौकरियां जाएंगी
भारतीय IT, फार्मा, टेक्सटाइल कंपनियां डॉलर में कमाती हैं। जब डॉलर सस्ता होगा यानी रुपया मजबूत होगा, तो उनकी कमाई रुपये में कम हो जाएगी।
IT एक्सपोर्ट घटेगा। फार्मा कंपनियों का मार्जिन सिकुड़ेगा। टेक्सटाइल इंडस्ट्री बांग्लादेश-वियतनाम से मुकाबला नहीं कर पाएगी।
Strong rupee = weaker exports. यही कारण है कि RBI भी नहीं चाहता कि रुपया बहुत ज्यादा मजबूत हो जाए। बहुत मजबूत रुपया एक्सपोर्ट घटाता है, मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ रोकता है, नौकरी बनना कम करता है।
इकोनॉमिक्स हमेशा ट्रेड-ऑफ है। एक चीज सुधारोगे, दूसरी बिगड़ेगी।
7. भारत पहले भी कोशिश कर चुका है - 2013 की गलती
2013 में सरकार ने सोने के आयात पर कड़ी ड्यूटी लगा दी। नतीजा क्या हुआ? सोने की तस्करी रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गई।
भारत ने सोना खरीदना बंद नहीं किया। भारत ने सिर्फ लीगल सोना खरीदना बंद किया। ब्लैक मार्केट, हवाला, स्मगलिंग बढ़ गई। सरकार को टैक्स का नुकसान अलग हुआ।
8. असली मौका: सोने से नहीं, सोच से लड़ना है
भारतीयों के पास 4 ट्रिलियन डॉलर का सोना तिजोरी में बंद है। ये रकम भारत की GDP के बराबर है।
जरा सोचिए अगर इसका सिर्फ 10% भी इकोनॉमी में काम करने लगे - भारतीय कंपनियों में, इंफ्रास्ट्रक्चर में, फैक्ट्री में, स्टार्टअप में - तो भारत की तस्वीर बदल सकती है।
लेकिन लोग सोना क्यों खरीदते हैं? क्योंकि सोना है:
संस्कृति, भरोसा, महिलाओं की सेविंग, ग्रामीण सुरक्षा।
अंतिम बात: भारत को कम सोने की नहीं, बेहतर विकल्पों की जरूरत है
समस्या सोना नहीं है। समस्या ये है कि लोगों को सोने से ज्यादा भरोसा किसी और चीज पर नहीं है।
जब तक हम ऐसे फाइनेंशियल सिस्टम नहीं बनाएंगे जिन पर लोग सोने जितना भरोसा करें - आसान म्यूचुअल फंड, सुरक्षित पेंशन स्कीम, पारदर्शी बैंकिंग - तब तक लोग सोना ही खरीदेंगे।
भारत को 'गोल्ड बैन' नहीं, 'गोल्ड से बेहतर' चाहिए। क्योंकि असली लक्ष्य रुपये को 80 पर लाना नहीं, हर भारतीय को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है।
और वो ताकत लॉकर में बंद सोने से नहीं, इकोनॉमी में दौड़ते हुए पैसे से आएगी।
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